कल रात नींद न आई
करवट बदल बदल कर
कोशिश
की थी सोने की
आखें खुद बा खुद भर आई
तुम्हारे न आने पर
मई उअड्स होता हूँ जब
भी
ऐसा ही होता वहहै मेरे साथ
फिर जलाई भी मैंने माचिस
और
बंद डायरी से निकली थी तुम्हारी तस्वीर
कुछ ही देर में बुझ गयी थी रौशनी
और उसमे खो गयी थी
तुम्हारी हसी
जिसे देखने की चाहत लिए मई
गुजर देता था रातों को
सजाता था सपने तुम्हारे
तारों के साथ
चाँद से भी खुबसूरत
लगती thi तुम
हाँ तुम से जब कहता ये
सब
तुम मुस्कुराकर
मुझे पागल
कहकर अ क्र चिढाती थी
मुझे अच्छा लगता था
तुमसे यु मिलना
जिसके लिए तुम लिखती चित्ती
लेकिन
कभी वो पास न आई मेरे
और जिसे पढ़ा था मैंने हमेश ही
Saturday, April 3, 2010
Wednesday, February 10, 2010
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम, ,,,,,,,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,
कविता में पिरे
शब्दों की व्यजंना हो तुम,
मर्म-स्पर्शी नव साहित्य की
सृजना हो तुम,
नव प्रभा की पथ प्रदर्शक
लालिमा हो तुम,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम,
स्वप्न दर्शी सुप्त आखों में
बसी तलाश हो तुम,
सावन की कजरी में घुली
मिठास हो तुम,
चन्द्र नगरी के चन्द्र रथ पर
सवार एक सुन्दरी हो तुम,
रस भरे अधरों के अलिंगन की
कल्पित एक स्वप्न परी हो तुम,
मेरे कोरे दिल की कल्पना हो तुम ...........
Friday, September 25, 2009
शाम >>
शाम की छाई हुई धुंधली
चादर से
ढ़क जाती हैं मेरी यादें ,
बेचैन हो उठता है मन,
मैं ढ़ूढ़ता हूँ तुमको ,
उन जगहों पर ,
जहां कभी तुम चुपके-चुपके मिलने आती थी ,
बैठकर वहां मैं
महसूस करना चाहता हूँ तुमको ,
हवाओं के झोंकों में ,
महसूस करना चाहता हूँ तुम्हारी खुशबू को ,
देखकर उस रास्ते को
सुनना चाहता हूँ तुम्हारे पायलों की झंकार को ,
और
देखना चाहता हूँ
टुपट्टे की आड़ में शर्माता तुम्हारा वो लाल चेहरा ,
देर तक बैठ
मैं निराश होता हूँ ,
परेशान होता हूँ कभी कभी ,
आखें तरस खाकर मुझपे,
यादें बनकर आंसू उतरती है गालों पर ,
मैं खामोशी से हाथ बढ़ाकर ,
थाम लेता हूं उन्हें टूटने से ,
इन्ही आंसूओं नें मुझे बचाया है टूटने से ,
फिर मैं उठता हूं
फीकी मुस्कान लिये
एक नयी शुरूआत करने ।
Friday, September 11, 2009
उछाल दो बातें
उछाल दो बातें उन पर
आज ये कहता है मन
सामने कर दो बयां काला दिल
जिसमें सपने सजाये आज तुमने
कह ना कितना कह ना था ,
यूं सोच न पाता कोई ,
है रूखसत जान अपनी ,
अब भला डरना क्या ?
उछाल दो बातें ....... ,
कर्म ऐसा भी नहीं की
दर्द भरता वो रहे ,
जाने कितना ही जिया है ,
आज मन मारे सही ,
कह दिया है मैं ये बात
उसके सामने ,
हो भला जो हो बुरा ,
कर अभी तू फैसला ,
कर अभी तू फैसला ।
Tuesday, August 11, 2009
बादलों में चांद छिपता
बादलों में चांद छिपता है,
निकलता है ,
कभी अपना चेहरा दिखाता है ,
कभी ढ़क लेता है ,
उसकी रोशनी कम होती जाती है
फिर अचानक वही रोशनी
एक सिरे से दूसरे सिरे तक तेज होती जाती है ।
मैं इस लुका छिपी के खेल को
देखता रहता हूँ देर तक,
जाने क्यूँ बादलों से
चांद का छिपना - छिपाना
अच्छा लग रहा है ,
खामोश रात में आकाश की तरफ देखना ,
मन को भा रहा है ,
उस चांद में झांकते हुए
न जाने क्यूँ तुम्हारा नूर नजर आ रहा है ।
ऐसे में तुम्हारी कमी का एहसास
बार - बार हो रहा है ।
तुम्हारी यादें चांद ताजा कर रहा है,
मैं तुमको भूलने की कोशिश करके भी ,
आज याद कर रहा हूँ ,
इन यादों की तड़प से
मन विचलित हो रहा है ,
शायद चांद भी ये जानता है कि-
मैं तुम्हारे बगैर कितना तन्हा हूँ ?
अधूरा हूँ ,
ये चांद तुम्हारी यादें दिलाकर
तुम्हारी कमी को पूरा कर रहा है
Thursday, June 4, 2009
आज भी तुमसे प्यार करता हूँ मैं.....................
यादें कितनी हैं , जो आज भी ताजा है जेहन में , किसी भी बात पर न जाने क्यूँ तुम ही याद आती हो, भूलना तो हुआ नहीं कभी , बहाना भले ही कितना किया हो तुमसे , आज
देखता हूँ मोबाइल पर लिखे हुए मैसेज को , तो प्यार के दिन बयां करते हैं है तुमको , जिससे मैंने वादा किया था साथ जीने मरने का , हर पल साथ देने का , शायद यह सब एक दिखावा ही था जो आज नहीं है , तुम ने मुझको भुलाया और मैंने तुमको ,
पर हकीकत में शायद आज भी एक दूसरे के बेहद करीब हैं । यह देखकर तुम खुश हो यही अच्छा लगता है मुझे । मैं पागल हूँ , मैं बदल गया हूँ , आज ये सारी बातें याद हैं पर क्या करूँ मैं मजबूर कर दिया है तुमने कसम देकर अपनी , उतना ही प्यार आज भी मैं करता हूँ तुमसे ,
पर कैसे बता पाऊंगा ? दिल में दबकर ही रह जायेगी यह सब बातें फिर भी मैं खुश हूँ कि - मैं तुमसे आज भी प्यार करता हूँ , तुम्हारे बगैर अधूरा हूँ , सोचता हूँ तुमको और खुश हो जाता हूँ अपने आप में .
Wednesday, May 27, 2009
ये हक है मेरा
बहुत कुछ बदल जाने के बाद भी ,
आज न जाने क्यूँ तुम्हारी यादें वैसी ही हैं ,
जैसे की पहले हुआ करती थी ,
मुझे पता है कि तुमसे कह नहीं सकता कुछ भी ,
बता नहीं सकता अपनी बातों को ,
पर फिर भी खुद को ही अच्छा लगता है सोचना ये ,
जिसे तुमने आकर्षण कहा,
दोस्ती कहा
या
कभी प्यार का नाम दिया ,
उनमें से कोई रिश्ता आज कायम नहीं ।
मैं सोचता हूँ सारी पुरानी बातें ,
जिसमें केवल मैं होता था और तुम होती थी ,
जो अब झूठी लगती हैं ,
एक धोखा लगती हैं ,
ये सब सोच के दर्द सा होता
पर भी ,
ये दिल है कि तुमको ही याद करता हैं ,
खामोश रात में बंद आखें तुमको ही खोजती हैं ,
फिर दिन के उजाले में तुम कहीं गुम हो जाती हो ,
इस तरह से आना जाना खुद को नहीं भाता ,
पर
मजबूर हूँ मैं जो तुम्हारी यादो से आज भी नहीं निकल पाता,
कभी कसम खाता हूँ ,
फिर तोड़ देता हूँ उसको तुम्हारे लिए ,
जब अब ये पता है कि
तुम मेरी नहीं हो ,
कभी भूल जाने का वादा अब तो हर रोज ही तोड़ता हूँ ,
शायद कभी मिल जाओं तो बातऊगा तुमको सारी बातें दिल,
कहूँगा जज्बात दिल के ,
और जाने नहीं दूंगा इस बार मैं ,
ये जिद मेरी रहती है अपने आपसे ,
जबकि ये जानता हूँ- ये कल्पना है इसके सिवा कुछ भी नहीं ,
पर इस तरह सोच के खुद को , बहलाता हूँ ,
तुमको अपने करीब पाता हूँ ,
ये हक मेरा तुम नहीं छिन सकती,
ये तुम भी नहीं जानती ,
याद करता हूँ और करता रहूँगा ,
ये जानलो तुम ।
आज न जाने क्यूँ तुम्हारी यादें वैसी ही हैं ,
जैसे की पहले हुआ करती थी ,
मुझे पता है कि तुमसे कह नहीं सकता कुछ भी ,
बता नहीं सकता अपनी बातों को ,
पर फिर भी खुद को ही अच्छा लगता है सोचना ये ,
जिसे तुमने आकर्षण कहा,
दोस्ती कहा
या
कभी प्यार का नाम दिया ,
उनमें से कोई रिश्ता आज कायम नहीं ।
मैं सोचता हूँ सारी पुरानी बातें ,
जिसमें केवल मैं होता था और तुम होती थी ,
जो अब झूठी लगती हैं ,
एक धोखा लगती हैं ,
ये सब सोच के दर्द सा होता
पर भी ,
ये दिल है कि तुमको ही याद करता हैं ,
खामोश रात में बंद आखें तुमको ही खोजती हैं ,
फिर दिन के उजाले में तुम कहीं गुम हो जाती हो ,
इस तरह से आना जाना खुद को नहीं भाता ,
पर
मजबूर हूँ मैं जो तुम्हारी यादो से आज भी नहीं निकल पाता,
कभी कसम खाता हूँ ,
फिर तोड़ देता हूँ उसको तुम्हारे लिए ,
जब अब ये पता है कि
तुम मेरी नहीं हो ,
कभी भूल जाने का वादा अब तो हर रोज ही तोड़ता हूँ ,
शायद कभी मिल जाओं तो बातऊगा तुमको सारी बातें दिल,
कहूँगा जज्बात दिल के ,
और जाने नहीं दूंगा इस बार मैं ,
ये जिद मेरी रहती है अपने आपसे ,
जबकि ये जानता हूँ- ये कल्पना है इसके सिवा कुछ भी नहीं ,
पर इस तरह सोच के खुद को , बहलाता हूँ ,
तुमको अपने करीब पाता हूँ ,
ये हक मेरा तुम नहीं छिन सकती,
ये तुम भी नहीं जानती ,
याद करता हूँ और करता रहूँगा ,
ये जानलो तुम ।
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