कल रात नींद न आई
करवट बदल बदल कर
कोशिश
की थी सोने की
आखें खुद बा खुद भर आई
तुम्हारे न आने पर
मई उअड्स होता हूँ जब
भी
ऐसा ही होता वहहै मेरे साथ
फिर जलाई भी मैंने माचिस
और
बंद डायरी से निकली थी तुम्हारी तस्वीर
कुछ ही देर में बुझ गयी थी रौशनी
और उसमे खो गयी थी
तुम्हारी हसी
जिसे देखने की चाहत लिए मई
गुजर देता था रातों को
सजाता था सपने तुम्हारे
तारों के साथ
चाँद से भी खुबसूरत
लगती thi तुम
हाँ तुम से जब कहता ये
सब
तुम मुस्कुराकर
मुझे पागल
कहकर अ क्र चिढाती थी
मुझे अच्छा लगता था
तुमसे यु मिलना
जिसके लिए तुम लिखती चित्ती
लेकिन
कभी वो पास न आई मेरे
और जिसे पढ़ा था मैंने हमेश ही
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Saturday, April 3, 2010
Tuesday, August 11, 2009
बादलों में चांद छिपता
बादलों में चांद छिपता है,
निकलता है ,
कभी अपना चेहरा दिखाता है ,
कभी ढ़क लेता है ,
उसकी रोशनी कम होती जाती है
फिर अचानक वही रोशनी
एक सिरे से दूसरे सिरे तक तेज होती जाती है ।
मैं इस लुका छिपी के खेल को
देखता रहता हूँ देर तक,
जाने क्यूँ बादलों से
चांद का छिपना - छिपाना
अच्छा लग रहा है ,
खामोश रात में आकाश की तरफ देखना ,
मन को भा रहा है ,
उस चांद में झांकते हुए
न जाने क्यूँ तुम्हारा नूर नजर आ रहा है ।
ऐसे में तुम्हारी कमी का एहसास
बार - बार हो रहा है ।
तुम्हारी यादें चांद ताजा कर रहा है,
मैं तुमको भूलने की कोशिश करके भी ,
आज याद कर रहा हूँ ,
इन यादों की तड़प से
मन विचलित हो रहा है ,
शायद चांद भी ये जानता है कि-
मैं तुम्हारे बगैर कितना तन्हा हूँ ?
अधूरा हूँ ,
ये चांद तुम्हारी यादें दिलाकर
तुम्हारी कमी को पूरा कर रहा है
Friday, May 15, 2009
आज शाम
आज की शाम मैं अकेला हूँ दूर दुनिया से तुम्हारे बिना शायद खामोश जुबान ही जता रही है तुम्हारी कमी को ..........पेड़ चुपके कह रहें हैं मुझसे , हवाएं अपनी सरसराहट से दिखा रही है रास्ता , चिड़िया चहचहाकर बतला रही है ये कि तुम नहीं हो ...........हमारा साथ इनको भी पता । जो कह नहीं सकते कुछ पर अपने इशारों से दिखा रहे हैं तुमको । मेरा वक्त अब इन सबसे दूर है तुम्हारे बिना कैसे कोई बताये तुमको कि तुम बिन सब अधूरा है ...........
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